धर्म आधारित आरक्षण भारत के लिए विष का प्याला


भारत में सत्ता हस्तांतरण के पश्चात आरक्षण उन वर्गो को दिया गया था जो बेहद दबे और कमजोर जाति से संबंध रखते थे तथा आरक्षण के बिना उनका आगे बढ़ना असम्भव था । ग्रामीण और उपनगरीय क्षेत्रों में तो उनकी परछाई तक प्रदूषित मानी जाती थी । मूल रूप से इसे अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए 10 वर्षो के लिए रखा गया था । मगर यह आरक्षण न केवल 64 वर्षो से चला आ रहा है , बल्कि विभिन्न समुदायों में विद्वेष पैदा करने के लिए फैलता भी जा रहा है । इसमें उन समुदायों की आवश्यकता से अधिक वोट बैंक की राजनीति का हाथ है ।
अब ये आरक्षण विकराल रूप लेने लगा है । हिन्दू समाज की गुर्जर , कुम्हार आदि जातियों के साथ - साथ मुस्लिम व ईसाई समाज भी धार्मिक आधार पर आरक्षण मांगने लगे है । आखिर आरक्षण कब समाप्त होगा ? क्या यह देश को अखंड व सुरक्षित रहने देगा ? देश के अन्य वर्ग , जाति और समुदाय कब तक चुप रहेंगे ? एक दिन वह भी आरक्षण की मांग करेंगे । सामान्य कहे जाने वाली जातियां भी आरक्षण की मांग करेंगी । क्योंकि उनके लिए तो कुछ भी नहीं बचता , क्योंकि आरक्षित वर्ग आरक्षण के कारण तो अपना अधिकार लेता ही है । सामान्य वर्ग के हिस्से में भी भागीदार हो जाता है , ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या सामान्य वर्ग में गरीब व बेसहारा नहीं है ? या तो सरकार हर जाति और समुदाय के गरीब परिवार के युवाओं को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दें या फिर आरक्षण को समाप्त कर दें । वरना आरक्षण पाओ और आबादी बढ़ाओं ही चलता रहेंगा । देश की चिन्ता कोई नहीं करेगा ।
25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में डॉ. भीमराव अम्बेदकर ने कहा था कि जातियां राष्ट्रविरोधी है । पहला , इसलिए कि ये सामाजिक जीवन में अलगाव लाती है । ये राष्ट्रविरोधी है क्योंकि ये समुदायों में ईष्या तथा घृणा पैदा करती है । यदि हम वास्तव में एक राष्ट्र बनाना चाहते है तो हमें इन सभी कठिनाईयों से पार पाना होगा । भाईचारा होगा तो ही राष्ट्र बनेगा ।
पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर का कहना है कि जाति के आधार पर आरक्षण तथा अन्य उपाय समाज तथा राष्ट्रहित में नहीं है । उन्होंने कहा कि यह अत्यन्त गरीब तथा सभी समुदायों के जरूरतमंद लोगों को मिलना चाहिए ।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सबको समान अवसर देने का वचन देता है तो अनुच्छेद 15 ( 1 ) के द्वारा यह विश्वास दिलाया गया है कि जाति , धर्म , संस्कृति या लिंग के आधार पर राज्य किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा । मुसलमान व ईसाई आदि अल्पसंख्यकों को भी बहुसंख्यकों के बराबर स्वतंत्रता व रोजगार का अधिकार प्राप्त है । भारत का संविधान स्पष्ट शब्दों में धर्म आधारित आरक्षण की मनाही करता है । तो भी सन 2004 में आंध्र प्रदेश की तत्कालीन राजशेखर रेड्डी की सरकार ने संविधान की मूल भावना के विरूद्ध अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण हेतु धर्म के आधार पर विभाजित भारत के इतिहास में धर्म के आधार पर आरक्षण का एक नया पन्ना जोड़ा । जिस पर सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ गौर कर रही है । अल्पसंख्यक वोटों के भूखे अन्य राजनीतिक दल भी इसका अनुकरण करने के लिए लालायित है ।
मुस्लिमों के लिए आरक्षण वस्तुतः उस मर्ज का इलाज ही नहीं है , जिससे मुस्लिम समुदाय ग्रस्त है । विडंबना यह है कि सेक्युलर दल अवसरवादी राजनीति के कारण उस मानसिकता को स्वीकारना नहीं चाहते । बुर्का प्रथा , बहुविवाह , मदरसा शिक्षा , जनसंख्या अनियंत्रण जैसी समस्याओं को दूर किए बगैर मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने की कवायद एक छलावा मात्र है । इस प्रतियोगी युग में भी अधिकांश मुस्लिम नेताओं द्वारा मदरसों की अरबी - फारसी शिक्षा को ही यथेष्ट माना जाना तथा अपने समुदाय के लोगों को जनसंख्या नियंत्रण के तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित न करना क्या दर्शाता है । वे अपनी बढ़ी आबादी के बल पर राजनीतिक दलों के साथ ब्लैकमेलिंग की स्थिति में है ।
हिन्दू और मुसलमानों की साक्षरता दर के साथ जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना करें तो मुस्लिमों के पिछड़ेपन का भेद खुल जाता है । केरल की औसत साक्षरता दर 90.9 प्रतिशत है । मुस्लिम साक्षरता दर 89.4 प्रतिशत होने के बावजूद जनसंख्या की वृद्धि दर 36 प्रतिशत है , जबकि हिन्दुओं में यह दर 20 प्रतिशत है । महाराष्ट्र में मुस्लिम साक्षरता दर 78 प्रतिशत होने के साथ ही जनसंख्या वृद्धि दर हिन्दुओं की तुलना में 52 प्रतिशत अधिक है । छत्तीसगढ़ में साक्षरता 82.5 प्रतिशत तो जनसंख्या दर हिन्दुओं की तुलना में 37 प्रतिशत अधिक है । संसाधन सीमित हो और उपभोक्ता असीमित तो कैसी स्थिति होगी ?
अल्पसंख्यक बोट बटोरने के लिए आरक्षण को एक हथियार के रूप में प्रयुक्त कर रही राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को खुले मस्तिष्क से धर्म आधारित आरक्षण के दीर्घकालिक परिणामों पर सोचना चाहिए । धर्म के आधार पर आरक्षण कालांतरण में राज्य व केन्द्र स्तर पर अलग - अलग क्षेत्रों की मांग का भी मार्ग प्रशस्त कर सकता है । जो भारत के लिए विष का प्याला सिद्ध होगा । जाति और धर्म आधारित आरक्षण समाज में मतभेद बढ़ाता है और राष्ट्रीय एकता को खंडित करने का काम करता है ।
दूसरी ओर आर्थिक आधार पर आधारित आरक्षण कोई फूट नहीं डालता और विभिन्न समुदायों में कोई वैमनस्य नहीं बढ़ाता । अभी भी आरक्षण का आधार आर्थिक करने का एक अवसर है , इस पर राष्ट्रीय सहमति बनाई जा सकती है । यदि धर्म आधारित आरक्षण दिया गया तो इसके परिणाम राष्ट्रीय एकता के लिए विष के समान घातक सिद्ध होगे ।
- विश्वजीत सिंह


@ राष्ट्रभक्तों के नाम एक आत्मीय निवेदन :- मित्रों यदि आप इन्टरनैट की दुनियां से बाहर निकल कर धरातल पर राष्ट्रहित में कुछ ठोस करने का ध्येय रखते है तो अपना नाम , पता , मोबाईल नं. , ईमेल आई डी , शिक्षा व जॉब प्रोफाईल सहित मुझे vishwajeetsingh1008@gmail.com पर ईमेल करें , जिससे भविष्य में धरातल पर सुसंगठित तरीके से कार्यारम्भ किया जा सकें ।
वन्दे मातरम्

4 comments:

  1. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति |
    बधाई स्वीकारें ||

    ReplyDelete
  2. आपने सटीक नजरिया रखा है ..
    हिन्दू लोग अपने धर्म का मर्म यही मानते हैं कि एक ही सत्य का साक्षात्कार अलग-अलग तरीकों से किया जा सकता है | अतः वे हर किसी को विद्वान समझ बैठते हैं, उसके पीछे चलने लगते हैं और भ्रम में रहते हैं कि वे भलाई के मार्ग पर हैं | लिहाज़ा कुछ हिन्दू अजमेर शरीफ़ की दरगाह पर चादर चढ़ाने के लिए दौड़े जाते हैं – जो पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ़ -मुहम्मद गौरी का साथ देनेवाले गद्दार की मज़ार है | शिवाजी के हाथों मारे गये -कुख्यात लुटेरे और बलात्कारी अफ़ज़ल खान की कब्र पर भी हिन्दू माथा टेकते नज़र आएंगे | हिन्दुओं की हर किसी में अच्छाई ही देखने की मूलभूत प्रवृति जो उनको उपासना की हर एक पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित करती है – आज उसके विनाश का कारण बन गयी है!!

    ReplyDelete
  3. मान्यवर, सच है धर्म पर आधारित आरक्षण विनाशक है।
    मेरा मानना है-
    मजहब हमें सिखाता आपस में बैर रखना,
    मजहब से दूर रहना मजहब से हमको डरना।
    मजहब बिना भी हम सब, रह सकते शांति सुख से।
    आपस में प्रेम सब में, मजहब का क्या है करना।।

    ReplyDelete
  4. देश का सत्यानाश करने का नायाब तरीका है फ़ूट डालो शासन करो।

    ReplyDelete