वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है । वेद का पढना पढ़ाना और सुनना सुनाना सभी आर्यों का परम धर्म है।
महर्षि दयानंद सरस्वती 


जिस तरह वर्ड कप के फ़ाइनल में सभी देशवासिओं के बीच एकजुटता दिखी सभी ने एक साथ मिल कर वर्ड कप जितने की ख़ुशी मनाई काश उसी तरह जीवन के हर क्षेत्रों में ऐसा ही होता
काश ! हम अपने को दूसरों से श्रेष्ठ मानने की  प्रवृत्ति को त्याग सकते
हम एक ही ईश्वर की संतान हैं, काश! हम धर्मान्तरण को बढ़ावा न देते हुवे इंसानियत को ही मुख्य धर्म मानते तो भारतीय समाज की यह स्थिति न होती
 इस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हमारा नव संवत्सर शुरू होता है. इस नव संवत्सर पर आप सभी को हार्दिक शुभ कामनाएं ……

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम
क्या रामायण एक काल्पनिक काव्य है?  आज कल पश्चिमी विद्वानों तथा उनका अन्धानुकरण करने वाले अनेक भारतीय विद्वानों ने राम के जीवन से सम्बंधित रामायण महाकाव्य की सत्यता तथा उसकी एतिहासिकता पर प्रश्नचिंह लगाये हैं तथा संदेह प्रकट किया है की क्या वास्तव में राम पैदा भी हुए थे या यह सिर्फ एक कपोल कल्पित कहानी है किन्तु इस तरह की विचार सत्य नहीं हैं
नवीनतम अनुसंधानों तथा प्राचीन एतिहासिक प्रमाणों के द्वारा यह पूरी तरह सिद्ध हो चूका है की मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम तथा योगी राज श्री कृष्ण जैसे महापुरुषों ने आर्यावर्त की पवित्र धरती पर जन्म लिया था तथा उनके जीवन की सत्य घटनाएँ ही रामायण और महाभारत में हैं  हाँ ये बात दूसरी है की कवियों ने कुछ बातों को बढ़ा चढ़ा कर लिखा हो
प्रायः लोगो का यह स्वभाव हो जाता है की वे अपने महान पुरुषों के चरित्र में अलौकिक या चमत्कार युक्त बातों का समावेश करते रहते हैं   राम, कृष्ण, गौतम, बुद्ध, ईशा मसीह आदि महापुरुष भी ऐसे लोगों द्वारा फैलाई गयी उन बातों से नहीं बच सके हैं
इसका अभिप्राय यह नहीं है की यह महापुरुष हुए ही नहीं या उनसे सम्बंधित सभी बातें काल्पनिक हों और उनका कोई एतिहासिक महत्व नहीं है 
यह तथ्य हमें जान लेना जरुरी है की महर्षि वाल्मीकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के समकालीन थेइस लिए उनके जन्म का सही निर्णय वाल्मीकि रामायण द्वारा ही किया जा सकता है। जिसके लिए वाल्मीकि रामायण स्वतः प्रमाण माना जायेगा तथा अन्य रामायण तथा पुस्तकें  परतः प्रमाण माने जायेंगे।  अर्थात जो जो बातें वाल्मीकि रामायण के अनुकूल होंगी वो प्रमाण कोटि में तथा जो प्रतिकूल होंगी वो अमान्य माने जायेंगे। महर्षि वाल्मीकि ने बाल कांड के ७० वें सर्ग में महाराजा इक्ष्वाकु से ले कर दसरथ पुत्र राम तक की वंशावली का वर्णन किया है और राम के जन्म दिन का जो स्पष्ट वर्णन किया है उससे यह सिद्ध होता है की ये कथा काल्पनिक नहीं है ।
महाराजा दशरथ के पुत्र श्रीराम का जन्म कब हुआ था इसके सम्बन्ध में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं लेकिन अधितर विद्वानों के राय में श्रीराम का जन्म त्रेता युग के अंत में माना गया है
इस मान्यता के अनुसार श्री राम के जन्म को नौ लाख वर्ष हो चुके हैं परन्तु जब हम आर्यों के प्राचीन इतिहास पर नजर डालते हैं तो श्री राम का जन्म और भी अधिक प्राचीन लगभग दो करोड़ वर्ष पूर्व सिद्ध होता है 
महर्षि वाल्मीकि ने बालकाण्ड के ७९ वें सर्ग में महाराजा इक्ष्वाकु से लेकर दशरथ पुत्र राम तक की वंशावली का वर्णन किया है और राम के जन्म दिन का जो वर्णन किया है उससे यह स्पष्ट है की यह कथा काल्पनिक नहीं है अपितु उनके जीवन काल की ही घटनाएँ हैं

ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे  नावमिके तिथौ
नक्षत्रेअदिति   देवात्ये सवोच्च- संस्थेशु पंचसु ।। ।।
ग्रहेषु कर्कटे  लग्ने वक्पताबिन्दुना  सह ।। ।।
कौशल्या जन्याद्रामं  दिव्यलक्षण संयुतम ।।१० ।।

अर्थात चैत्र मास की नवमी को शुक्ल पक्ष में पुनर्वसु नक्षत्र में पांच ग्रहों के अपने उच्च स्थानों पर स्थित  होने पर कर्क लग्न में बृहस्पति और चंद्रमा के संयोग होने पर श्री रामचन्द्र को कौशल्या ने जन्म दिया यंहा उनके जन्म का तो उल्लेख है किन्तु वर्ष आदि का उल्लेख नहीं मिलता इसका पता हमें महाभारत के वन पर्व मे मिलता है इसके अनुसार त्रेता और द्वापर की संधि में सशस्त्र धारियों में श्रेष्ठ श्री राम हुवे जिन्होंने अत्याचारी रावण आदि दुष्टों को मारा अर्थात श्री राम का जन्म त्रेता और द्वापर युग की संधि में हुआयदि  हम राम के जन्म निर्धारण के लिए सबसे अंतिम चतुर्युगी का ही आकलन करें तो भी उनका जन्म निम्न लिखित  वर्ष पूर्व हुआ –

द्वापर के वर्ष                                ८,६४००० वर्ष        
आज तक वर्तमान कलयुग के वर्ष            ५११०वर्ष         
                                    योग == ८६९११०वर्ष 

अर्थात अप्रैल २०११ में श्री राम के जन्म को आठ लाख उन्सठ हजार एक सौ दस वर्ष पुरे हो गए हैं। वैसे अनेक विद्वानों ने युग वर्ष गणना के अनुसार यह सिद्ध किया है की आज से 1,81,49,12 वर्ष पूर्व श्री राम चन्द्र जी का जन्म हुआ था 
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से बढ़ कर आर्य संस्कृति का प्रतीक दुर्लभ है राम आर्यावर्त और भारतीय इतिहास के प्रतिनिधि के रूप में मुख्यतः प्रेरणा स्त्रोत्र हैं
मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं के जो आदर्श माने गए हैं उन सभी का हमें राम के रूप में दर्शन होता है
राम एक आदर्श प्रजावत्सल राजा हैं जिन्होंने प्रजा को संतुष्ट करने के लिए अपनी पतिवर्ता पत्नी तक का त्याग कर दिया
राम एक आदर्श पुत्र हैं पितृ भक्ति की जो मर्यादा अथवा मानदंड वे स्थापित कर गए हैं उसे आज तक कोई भी नहीं छू पाया 
पितृ भक्ति का आदर्श यह है की पिता की न केवल आज्ञाओं का ही अनुपालन हो, उनकी इक्षाओं एवं सम्मान का भी समुचित आदर एवं उनकी पूर्ति हो, इसके साथ-साथ वह पिता की कीर्ति की बृद्धि करने वाली हो 
राम एक आदर्श पति हैं राम एक आदर्श भाई हैं तथा एक आदर्श स्वामी हैं  
आज के युग में जब मानवता का सर्वत्र ह्लास हो रहा है, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की प्रासंगिता और भी बढ़ गयी है
वैदिक विचार धारा ही एक मात्र ऐसी विचार धारा है जो हमें श्रीराम के पावन जीवन से कुछ प्रेरणा लेने और उनका अनुकरण करने के लिए सदैव प्रेरित करती रहती है 
हमारे पौराणिक भाइयों ने तो ऐसे  महापुरुषों को ईश्वर का अवतार बता कर के अनुकरण की कोटि से सर्वदा दूर कर दिया है
आज हम राम को मानते हैं पर राम की नहीं मानते 
कृष्ण को मानते हैं पर कृष्ण की नहीं मानते।
हमारा ये मानना है की जो राम ने किया वो एक ईश्वर का अवतार ही कर सकता है हमारे बस का नहीं है और यही गलत भावना हमारे पतन का कारण रहा है।
हमें ये बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए की अब कोई भी मसीहा हमें बचाने नहीं आएगा ।
जहाँ तक मेरा विश्वास है लोगों को  चित्र की नहीं चरित्र की पूजा में अधिक विश्वास रखनी चाहिए
हमें श्री राम के जीवन से कुछ प्रेरणा लेकर उनके जैसा बनना होगा।
रावण वेद का सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है तथा राम वेद, वेदांगों  के आदर्श विद्वान थे
उन्होंने न केवल वेद पढ़े ही थे अपितु उनके उपदेशों को जीवन में भी उतारा था 
राम ने एक आदर्श शत्रु का भी धर्म, मर्यादा पूर्वक निभाया
रावण उनका शत्रु था, परम शत्रु
किन्तु जब रावण की मृत्यु हो गयी तो रोते हुवे उसके भाई विभीषण को राम ने सांत्वना देते हुवे कहा –
“शत्रुता तो मरने के बाद समाप्त हो जाती है जो हमारा उद्देश्य था वो तो पूरा हो गया है अब इसका सम्मान के साथ विधि पूर्वक दाह संस्कार करो  अब तो यह मेरा भी ऐसा ही है जैसा की आपका।“

मरणान्तानी वैराणी  निवृत्तम  नः प्रयोजनम। 
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव।। लंका  १०९-२५

मरे हुवे रावण के विषय में यह वाक्य की “रावण अब मेरा भी ऐसा ही है जैसा तेरा “ राम का यह वाक्य उनकी उच्चता तथा सदाशयता का तो परिचायक तो है ही उनके आदर्श शत्रु होने का भी उदघोषक है


9 comments:

  1. बहुत ही सुंदर रचना, बार बार पढने को मन करता हे हे, धन्यवाद

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  2. बहुत ही सुंदर रचना, बार बार पढने को मन करता हे हे, धन्यवाद

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  3. यह वाक्य की “रावण अब मेरा भी ऐसा ही है जैसा तेरा “ राम का यह वाक्य उनकी उच्चता तथा सदाशयता का तो परिचायक तो है ही उनके आदर्श शत्रु होने का भी उदघोषक है।

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  4. "प्रायः लोगो का यह स्वभाव हो जाता है की वे अपने महान पुरुषों के चरित्र में अलौकिक या चमत्कार युक्त बातों का समावेश करते रहते हैं"
    राम के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों को बहुत सटीक ज़वाब दिया है

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  5. मदन जी सादर नमस्ते! माफ़ कीजिये मैं शायद बहुत देर के बाद आप के यहाँ आई हूँ. आपके लेखों में जाने क्यों एक विद्रोह की झलक मिलती है. आपने भगवन राम के बारे बहुत ही विलक्षण जानकारी दी है

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  6. धर्म सनातन अनादी अनंत है सम्प्रदाय सभी नए जो एक दिन प्राचीन होकर नष्ट भी हो जायेंगे किन्तु परमेश्वर का धर्म वेद ज्ञान सदा एक रस सनातन है जिसको कोई नष्ट नहीं कर सकता किन्तु लोगो के मिथ्या प्रलापों द्वारा धर्म हानि होने से ज्ञान-विज्ञान की क्षति हो रही है और वह मानव की असंतुष्टि का या दुःख का एक बड़ा कारण है. सभी हिन्दुओं को अपने मूल सनातन वैदिक धर्म से शिक्षा लेनी चाहिए और उसका प्रसार भी करना चाहिये जिससे वे स्वयं और मानव जाति में विज्ञान का प्रसार होके सभी लोग भी सुखपूर्वक रह सकें.

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  7. बहुत सुन्दर लेख ..भगवान श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम के विषय में अत्यंत ही उपयोगी जानकारी दे है आपने....सदा जय हो आपकी...

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